2.18.2Rigved
श्लोक:२.१८.२ (2.18.2)सूक्त (१८)

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श्लोक:२.१८.२ (2.18.2)सूक्त (१८)

सास्मा॒ अरं॑ प्रथ॒मं स द्वि॒तीय॑मु॒तो तृ॒तीयं॒ मनु॑षः॒ स होता॑ । अ॒न्यस्या॒ गर्भ॑म॒न्य ऊ॑ जनन्त॒ सो अ॒न्येभिः॑ सचते॒ जेन्यो॒ वृषा॑ ॥ (२)

मानवों के लिए उत्तम फल देने वाला यज्ञ इंद्र के लिए, प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय सवन में पूरा हुआ है. ऋत्विजों ने यज्ञ को धरती के गर्भ के रूप में उत्पन्न किया है. कामवर्षक एवं विजयदाता यज्ञ देवों के साथ मिल जाता है. (२)

The yajna, which gives the best results for humans, has been completed for Indra, in the first, second and third savan. The Ritvijas have created the yajna as the womb of the earth. The workman and the conqueror get along with the yajna devas. (2)