2.2.2Rigved
श्लोक:२.२.२ (2.2.2)सूक्त (२)
Shlok 1 of 1
अ॒भि त्वा॒ नक्ती॑रु॒षसो॑ ववाशि॒रेऽग्ने॑ व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नवः॑ । दि॒व इ॒वेद॑र॒तिर्मानु॑षा यु॒गा क्षपो॑ भासि पुरुवार सं॒यतः॑ ॥ (२)
हे अग्नि! गाएं जिस प्रकार दिन में बछड़े की इच्छा करती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें रात और दिन चाहते हैं. हे सर्वप्रिय! तुम संयमशील रूप में स्वर्ग में व्याप्त हो, मनुष्यों के यज्ञों में निवास करते हो एवं रात में प्रकाशित होते हो. (२)
O agni! Just as you desire a calf by day, so the hosts want you night and day. O beloved! You are patiently pervaded heaven, dwelling in the sacrifices of men and being illuminated at night. (2)