3.1.3Rigved
श्लोक:३.१.३ (3.1.3)सूक्त (१)

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श्लोक:३.१.३ (3.1.3)सूक्त (१)

मयो॑ दधे॒ मेधि॑रः पू॒तद॑क्षो दि॒वः सु॒बन्धु॑र्ज॒नुषा॑ पृथि॒व्याः । अवि॑न्दन्नु दर्श॒तम॒प्स्व१॒॑न्तर्दे॒वासो॑ अ॒ग्निम॒पसि॒ स्वसॄ॑णाम् ॥ (३)

मेधावी, शुद्धबलयुक्त, जन्म से ही उत्तम बंधु, स्वर्ग का सुख विधान करने वाले एवं सुंदर अग्नि को हमने बहने वाली नदियों के जल के भीतर से यज्ञकार्य के हेतु प्राप्त किया है. (३)

We have obtained the meritorious, pure-strength, the best brothers from birth, the happy ones of heaven and the beautiful agni for the work of yajna from within the waters of the rivers flowing. (3)