1.100.7Rigved
श्लोक:१.१००.७ (1.100.7)सूक्त (१००)
Shlok 1 of 1
तमू॒तयो॑ रणय॒ञ्छूर॑सातौ॒ तं क्षेम॑स्य क्षि॒तयः॑ कृण्वत॒ त्राम् । स विश्व॑स्य क॒रुण॑स्येश॒ एको॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥ (७)
वीर पुरुषों द्वारा लड़े गए संग्राम में मरुत् शब्द द्वारा जिस इंद्र को प्रसन्न करते हैं एवं मनुष्य जिसे रक्षणीय धन का रखवाला बनाते हैं, वे अभिमत फल देने में एकमात्र समर्थ इंद्र मरुतों की सहायता से हमारे रक्षक बनें. (७)
In the struggle fought by the brave men, the Indra who is appeased by the word 'marut' and the man who is made the keeper of the protective wealth, be our protectors with the help of indra maruts, the only one able to give the happy fruit. (7)