1.144.6Rigved
श्लोक:१.१४४.६ (1.144.6)सूक्त (१४४)

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श्लोक:१.१४४.६ (1.144.6)सूक्त (१४४)

त्वं ह्य॑ग्ने दि॒व्यस्य॒ राज॑सि॒ त्वं पार्थि॑वस्य पशु॒पा इ॑व॒ त्मना॑ । एनी॑ त ए॒ते बृ॑ह॒ती अ॑भि॒श्रिया॑ हिर॒ण्ययी॒ वक्व॑री ब॒र्हिरा॑शाते ॥ (६)

हे अग्नि! जिस प्रकार पशुपालक अपनी शक्ति से पशुओं पर अधिकार करता है, उसी प्रकार तुम आकाश एवं धरती पर वर्तमान प्राणियों के स्वामी हो. इसी कारण विस्तृत ऐश्वर्य वाले, हिरण्यमय, शोभन शब्द करने वाले, श्वैतवर्ण एवं प्रसिद्ध द्यावापृथ्वी यज्ञ में आते हैं. (६)

O fire! Just as the herder takes over animals by his power, so you are the masters of the present beings in the sky and on earth. That is why those with wide splendor, hiranyamaya, shobhan words, shvaitavarna and the famous dyawapatrithvi come to the yajna. (6)