1.182.3Rigved
श्लोक:१.१८२.३ (1.182.3)सूक्त (१८२)
Shlok 1 of 1
किमत्र॑ दस्रा कृणुथः॒ किमा॑साथे॒ जनो॒ यः कश्चि॒दह॑विर्मही॒यते॑ । अति॑ क्रमिष्टं जु॒रतं॑ प॒णेरसुं॒ ज्योति॒र्विप्रा॑य कृणुतं वच॒स्यवे॑ ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम इस मनुष्य के समीप क्यों ठहरे हो? यदि व्यक्ति यज्ञरहित होकर भी लोगों में आदर पा रहा हो तो उसे हराओ. उस पणि के प्राणों का नाश करो. मैं मेधावी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. मुझे प्रकाश दो. (३)
O Ashwinikumaro! What are you doing here? Why are you near this man? If a person is getting respect among the people even without being a yagna, defeat him. Destroy the souls of that cow. I am praising you brilliantly. Give me the light. (3)