1.31.7Rigved
श्लोक:१.३१.७ (1.31.7)सूक्त (३१)
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त्वं तम॑ग्ने अमृत॒त्व उ॑त्त॒मे मर्तं॑ दधासि॒ श्रव॑से दि॒वेदि॑वे । यस्ता॑तृषा॒ण उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ मयः॑ कृ॒णोषि॒ प्रय॒ आ च॑ सू॒रये॑ ॥ (७)
हे अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करता है, उसके लिए तुम अन्न प्रदान करने हेतु उत्तम और स्थायी पद पर प्रतिष्ठित कर देते हो. जो यजमान मनुष्यों एवं पशुओं को प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक है, उस बुद्धिमान् यजमान को तुम सुख और अन्न दो. (७)
O agni! For the man who serves you, you establish yourself in a good and permanent position to provide food. Give happiness and food to the wise man who is very eager to receive the host, man and animals. (7)