1.2.4Atharvaved
मंत्र:१.२.४ (1.2.4)सूक्त (२)

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मंत्र:१.२.४ (1.2.4)सूक्त (२)

यथा॒ द्यां च॑ पृथि॒वीं चा॒न्तस्तिष्ठ॑ति॒ तेज॑नम् । ए॒वा रोगं॑ चास्रा॒वं चा॒न्तस्ति॑ष्ठतु॒ मुञ्ज॒ इत् ॥ (४)

जिस प्रकार पृथ्वी और द्युलोक के मध्य तेज रहता है, उसी प्रकार यह बाण बहुमूत्र, अतिसार (दस्त) आदि रोगों तथा घावों को दबाए रहे. (४)

Just as there is a sharp place between the earth and the sun, in the same way, this arrow suppresses diseases and wounds like polyurine, diarrhea, etc. (4)