11.1.4Atharvaved
मंत्र:११.१.४ (11.1.4)सूक्त (१)
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समि॑द्धो अग्ने स॒मिधा॒ समि॑ध्यस्व वि॒द्वान्दे॒वान्य॒ज्ञियाँ॒ एह व॑क्षः । तेभ्यो॑ ह॒विः श्र॒पयं॑ जातवेद उत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥ (४)
हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४)
O blazing agni! You become more luminous through the samidhas and bring them here knowing the gods worthy of yajna. O jataved agni! For those gods, while cooking the havi of Brahmaodan, you take this host to the best heavenland. (4)