11.1.7Atharvaved
मंत्र:११.१.७ (11.1.7)सूक्त (१)

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मंत्र:११.१.७ (11.1.7)सूक्त (१)

सा॒कं स॑जा॒तैः पय॑सा स॒हैध्युदु॑ब्जैनां मह॒ते वी॒र्याय । ऊ॒र्ध्वो नाक॒स्याधि॑ रोह वि॒ष्टपं॑ स्व॒र्गो लो॒क इति॒ यं वद॑न्ति ॥ (७)

हे यजमान! तू समान जन्म वाले पुरुषों के साथ कर्मफल के सहित वृद्धि को प्राप्त हो एवं इस पत्नी को अधिक वीर्य प्राप्त करने हेतु स्वाभिमानी बने. हे यजमान! तू देहांत के पश्चात उस स्वर्ग में पहुंच, जिसे उत्तम कर्मो का फल कहा जाता है. (७)

O host! May you attain growth with the fruits of karma with men of equal birth and become self-respecting to get more semen to this wife. O host! After your death, you reach the heaven, which is called the fruit of good deeds. (7)