11.6.3Atharvaved
मंत्र:११.६.३ (11.6.3)सूक्त (६)

Shlok 1 of 1

मंत्र:११.६.३ (11.6.3)सूक्त (६)

यत्प्रा॒ण स्त॑नयि॒त्नुना॑भि॒क्रन्द॒त्योष॑धीः । प्र वी॑यन्ते॒ गर्भा॑न्दध॒तेऽथो॑ ब॒ह्वीर्वि जा॑यन्ते ॥ (३)

जब प्राण अर्थात्‌ सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से उत्पन्न होती हैं. (३)

When prana i.e. suryakya dev thunders by targeting barley, wheat, and wild trees through cloud sound in the rainy season, then all crops conceive and are produced in many ways. (3)