12.1.4Atharvaved
मंत्र:१२.१.४ (12.1.4)सूक्त (१)

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मंत्र:१२.१.४ (12.1.4)सूक्त (१)

यस्या॒श्चत॑स्रः प्र॒दिशः॑ पृथि॒व्या यस्या॒मन्नं कृ॒ष्टयः॑ संबभू॒वुः । या बिभ॑र्ति बहु॒धा प्रा॒णदेज॒त्सा नो॒ भूमि॒र्गोष्वप्यन्ने॑ दधातु ॥ (४)

जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४)

The earth on which there are four directions, on which food is produced and on which farmers cultivate and which holds breathing and moving creatures, that earth should sing milch and eat food for us. (4)