13.3.1Atharvaved
मंत्र:१३.३.१ (13.3.1)सूक्त (३)

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मंत्र:१३.३.१ (13.3.1)सूक्त (३)

य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ज॒जान॒ यो द्रापिं॑ कृ॒त्वा भुव॑नानि॒ वस्ते॑ । यस्मि॑न्क्षि॒यन्ति॑ प्र॒दिशः॒ षडु॒र्वीर्याः प॑त॒ङ्गो अनु॑ वि॒चाक॑शीति । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१)

इस आकाश और पृथ्वी को उन्होंने प्रकट किया जो सभी लोकों को आच्छादित करते हैं, जिन में छह उर्वियां और दिशाएं निवास करती हैं. जिन दिशाओं को वे ही प्रकाशित करते हैं, उन क्रोधपूर्ण सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान्‌ ब्राह्मण की हिंसा करता है अथवा कष्ट देता है, हे रोहित देव! तुम उस को कंपित करो तथा उसे क्षीण करते हुए बंधन में डाल दो. (१)

He revealed this sky and earth that covers all the worlds, in which six bodies and directions reside. The directions he illuminates, the angry sun that insults the learned Brahmin, who commits violence or suffering, O Rohit Dev! You make him tremble and weaken him and put him in bondage. (1)