13.3.4Atharvaved
मंत्र:१३.३.४ (13.3.4)सूक्त (३)
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यः प्राणे॑न॒ द्यावा॑पृथि॒वी त॒र्पय॑त्यपा॒नेन॑ समु॒द्रस्य॑ ज॒ठरं॒ यः पिप॑र्ति । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (४)
जो देवता प्राण, आकाश और पृथ्वी को तृप्त करता है तथा अपमान से समुद्र के पेट को पालता है, क्रोध में भरे उस के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव कंपित करते हुए क्षीण बनाओ एवं बंधन में डालो. (४)
The god who satisfies the life, the sky and the earth and nurtures the stomach of the sea with humiliation, make the violent of his criminal and learned Brahmin filled in anger, O Rohit Dev, staggering and put it in bondage. (4)