13.3.6Atharvaved
मंत्र:१३.३.६ (13.3.6)सूक्त (३)

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मंत्र:१३.३.६ (13.3.6)सूक्त (३)

यस्मि॒न्षडु॒र्वीः पञ्च॒ दिशो॒ अधि॑श्रि॒ताश्चत॑स्र॒ आपो॑ य॒ज्ञस्य॒ त्रयो॒ऽक्षराः॑ । यो अ॑न्त॒रा रोद॑सी क्रु॒द्धश्चक्षु॒षैक्ष॑त । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (६)

पांच दिशाएं, छह उर्वियां, चार जलों तथा यज्ञ के तीन अक्षर जिस में आश्रित हैं, जो आकाश और पृथ्वी के मध्य अपने क्रोधपूर्ण नेत्र से देखता है, उस क्रोधवान देवता के अपराधी तथा विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाश में बांध लो. (६)

O Rohit Dev, the criminal of the angry deity and the violent of the learned Brahmin, the five directions, the six urvis, the four waters and the three letters of the yajna in which they are dependent, who sees with his angry eye between the sky and the earth, O Rohit Dev! Make the staggering attenuated and tie in your loop. (6)