15.5.7Atharvaved
मंत्र:१५.५.७ (15.5.7)सूक्त (५)
Shlok 1 of 1
प॑शु॒पति॑रेनमिष्वा॒सः प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः । नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (७)
जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७)
Whoever knows this, Pashupati adapts to him from the corner of the west direction. Pashupati does not do violence to men and animals that suit him. (7)