16.3.6Atharvaved
मंत्र:१६.३.६ (16.3.6)सूक्त (३)

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मंत्र:१६.३.६ (16.3.6)सूक्त (३)

अ॑संता॒पं मे॒हृद॑यमु॒र्वी गव्यू॑तिः समु॒द्रो अ॑स्मि॒ विध॑र्मणा ॥ (६)

दो कोस तक की भूमि मेरे अधिकार में हो. मेरा हृदय कभी संतप्त न रहे. मैं धारण करने की शक्ति के द्वारा सागर के समान गंभीर बनूं. (६)

Land up to two kos should be in my possession. May my heart never be angry. I should be as serious as the ocean by the power to hold. (6)