16.5.5Atharvaved
मंत्र:१६.५.५ (16.5.5)सूक्त (५)
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वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्र॒मभू॑त्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात् दरिद्रता के पुत्र हो. हे स्वप्र! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
O dream! We know your origin. You are the sons of death and abhuti i.e. poverty. O self- We know you very well. You protect us from bad dreams. (5)