16.5.6Atharvaved
मंत्र:१६.५.६ (16.5.6)सूक्त (५)

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मंत्र:१६.५.६ (16.5.6)सूक्त (५)

वि॒द्म ते॑स्वप्न ज॒नित्रं॒ निर्भू॑त्याः पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसिमृ॒त्युर॑सि । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्नदुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (६)

हे स्वप्र! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात्‌ निर्धनता के पुत्र और यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्र से बचाओ. (६)

O self- We know your origin. You are nirbhuti i.e. the son of poverty and the instrument of Yamraj. We know you very well, so you save us from evil self-respect. (6)