17.1.10Atharvaved
मंत्र:१७.१.१० (17.1.10)सूक्त (१)

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मंत्र:१७.१.१० (17.1.10)सूक्त (१)

त्वं न॑इन्द्रो॒तिभिः॑ शि॒वाभिः॒ शन्त॑मो भव । आ॒रोहं॑स्त्रिदि॒वं दि॒वो गृ॑णा॒नःसोम॑पीतये प्रि॒यधा॑मा स्व॒स्तये॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धा वी॒र्याणि । त्वं नः॑पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (१०)

हे इंद्र! तुम अपनी मंगलमयी रक्षाओं के द्वारा हमारे लिए अधिक सुखकारी बनो. तुम अंतरिक्ष संबंधी स्वर्ग पर चढ़ते हुए सोम याग में सोमरस पीने के लिए आओ. हे प्रिय निवास स्थानों वाले इंद्र! तुम हमारे कल्याण के निमित्त पधारो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात्‌ शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है. उस में हमें स्थापित करो. (१०)

O Indra! May you be more pleasing to us through your auspicious defenses. You come to drink Somers in Mon Yag while climbing to space-related paradise. O swami Indra! Come for our welfare. O broad Indra! Your semen i.e. powers are infinite. May you complete us with animals of many forms like cows, horses, etc. and the supreme vyom is the improvement. Install us in that. (10)