17.1.8Atharvaved
मंत्र:१७.१.८ (17.1.8)सूक्त (१)

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मंत्र:१७.१.८ (17.1.8)सूक्त (१)

मा त्वा॑दभन्त्सलि॒ले अ॒प्स्वन्तर्ये पा॒शिन॑ उप॒तिष्ठ॒न्त्यत्र॑ । हि॒त्वाश॑स्तिं॒दिव॒मारु॑क्ष ए॒तां स नो॑ मृड सुम॒तौ ते॑ स्याम॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धा वी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (८)

हे पाशों को धारण करने वाले सूर्य! राक्षस तुम्हें जलों में प्रवेश करने से न रोकें. तुम उस निंदा को त्याग कर आकाश में आरोहण करो. तुम मुझ पर कृपा करो. हम तुम्हारी शोभन बुद्धि में रहें. हे व्याप्त होने वाले सूर्य! यहां तुम्हारे वीर्य अर्थात्‌ शक्तियां अनेक हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (८)

O sun holding loops! Demons should not stop you from entering the waters. You abandon that condemnation and ascend into the sky. You have mercy on me. May we live in your beautiful intellect. O sun that is shining! Here your semen means many powers. You complete us with animals of many forms like cows, horses, etc. and establish us in the goodness that is in the Supreme Vyom. (8)