17.1.9Atharvaved
मंत्र:१७.१.९ (17.1.9)सूक्त (१)

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मंत्र:१७.१.९ (17.1.9)सूक्त (१)

त्वं न॑ इन्द्रमह॒ते सौभ॑गा॒याद॑ब्धेभिः॒ परि॑ पाह्य॒क्तुभि॒स्तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धा वी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्विश्वरूपैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (९)

हे परम ऐश्वर्य संपन्न सूर्य! ऐश्वर्य को प्राप्त करने के हेतु तुम बहुत से पराक्रम करते हो. बुम व्याधि, चोर, भूत, राक्षस, अग्निदाह आदि की हिंसा से रहित दिवसों के द्वारा हमारी रक्षा करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात्‌ शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से मुझे पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थापित करो. (९)

O Sun with supreme opulence! You do many might to achieve opulence. Protect us through days devoid of violence of bum disease, thief, ghost, demon, agni, etc. O broad sun! Your semen i.e. powers are of many types. You complete me with animals of many forms like cows, horses, etc. and establish me in the sudha that is in the supreme vyom. (9)