18.1.3Atharvaved
मंत्र:१८.१.३ (18.1.3)सूक्त (१)

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मंत्र:१८.१.३ (18.1.3)सूक्त (१)

उ॒शन्ति॑ घा॒ तेअ॒मृता॑स ए॒तदेक॑स्य चित्त्य॒जसं॒ मर्त्य॑स्य । नि ते॒ मनो॒ मन॑सि धाय्य॒स्मेजन्युः॒ पति॑स्त॒न्वमा वि॑विष्याः ॥ (३)

यमी-हे यम! मरुद्गण उस मार्ग की इच्छा करते हैं, जिस का मैं ने तुम से निवेदन किया है. इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर लगाओ. फिर तुम संतान को उत्पन्न करने वाले मेरे पति बनते हुए भाई के भाव को छोड़ कर मुझ में प्रविष्ट हो जाओ. (३)

Yami- O Yama! The Deserts desire the way I have requested you. So you turn your mind to me. Then you become my husband who produces children and leave the feeling of brother and enter me. (3)