18.2.7Atharvaved
मंत्र:१८.२.७ (18.2.7)सूक्त (२)

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मंत्र:१८.२.७ (18.2.7)सूक्त (२)

सूर्यं॒ चक्षु॑षागच्छ॒ वात॑मा॒त्मना॒ दिवं॑ च॒ गच्छ॑ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑भिः । अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा॒ शरी॑रैः ॥ (७)

हे प्रेत! तू नेत्र द्वार से सूर्य को प्राप्त हो. तू आत्मा के द्वारा वायु को प्राप्त हो तथा वन्य इंद्रियों से आकाश और पृथ्वी को प्राप्त हो तथा अंतरिक्ष और जल को प्राप्त हो. यदि इन स्थानों में जाने की तेरी इच्छा हो तो जा अथवा ओषधि आदि में प्रविष्ट हो जा. (७)

O ghost! You receive the sun through the door of the eye. You receive air through the Spirit and the heavens and earth from the wild senses and receive space and water. If you want to go to these places, then go or enter medicine etc. (7)