18.4.1Atharvaved
मंत्र:१८.४.१ (18.4.1)सूक्त (४)

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मंत्र:१८.४.१ (18.4.1)सूक्त (४)

आ रो॑हत॒जनि॑त्रीं जातवेदसः पितृ॒याणैः॒ सं व॒ आ रो॑हयामि । अवा॑ड्ढ॒व्येषि॒तो ह॑व्यवा॒हई॑जा॒नं यु॒क्ताः सु॒कृतां॑ धत्त लो॒के ॥ (१)

हे अग्नियो! तुम अपनी उत्पन्न करने वाली के पास पहुंचो. मैं तुम्हें पितृयान मार्गो से वहां भलीभांति पहुंचाता हूं. हव्यों के वाहक अग्नि हव्यों को वहन करते हैं. हे अग्नियो! तुम मिल कर यज्ञकर्ताओं को श्रेष्ठ कर्म करने वालों के लोकों में पहुंचाओ. (१)

O agni! You reach out to your creator. I take you there well through pitrayana routes. The carriers of the havyas carry the agni havyas. O agni! Together, bring the yajnayas to the worlds of those who do the best deeds. (1)