18.4.8Atharvaved
मंत्र:१८.४.८ (18.4.8)सूक्त (४)

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मंत्र:१८.४.८ (18.4.8)सूक्त (४)

अङ्गि॑रसा॒मय॑नं॒पूर्वो॑ अ॒ग्निरा॑दि॒त्याना॒मय॑नं॒ गार्ह॑पत्यो॒ दक्षि॑णाना॒मय॑नं दक्षिणा॒ग्निः । म॑हि॒मान॑म॒ग्नेर्विहि॑तस्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सम॑ङ्गः॒ सर्व॒ उप॑ याहि श॒ग्मः ॥ (८)

आंगिरसों का मार्ग पूर्व के नाम की अग्नि है. आदित्यों का मार्ग गार्हपत्य अग्नि है. यज्ञ कार्य में दक्ष जनों का मार्ग दक्षिणा अग्नि है. वेदमंत्रों के द्वारा यज्ञ में स्थापित की गई अग्नि की महिमा को दृढ़ अंगों तथा पूर्ण शरीर वाला तू प्राप्त कर. (८)

The path of the Angiras is the agni of the name of the east. The path of adityas is the agni of garhapatya. Dakshina Agni is the path of skilled people in yajna work. You get the glory of agni established in the yajna through Veda mantras with strong limbs and full body. (8)