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आकू॑तिं दे॒वीं सु॒भगां॑ पु॒रो द॑धे चि॒त्तस्य॑ मा॒ता सु॒हवा॑ नो अस्तु । यामा॒शामेमि॒ केव॑ली॒ सा मे॑ अस्तु वि॒देय॑मेनां॒ मन॑सि॒ प्रवि॑ष्टाम् ॥ (२)
मैं तात्पर्य रूप, प्रकाशित होने वाली एवं शोभन भाग्य से युक्त वाणी अर्थात् सरस्वती की सेवा करता हूं. पुत्र जिस प्रकार माता के वश में होता है, उसी प्रकार मेरे मन को वश में रखती हुई हमारे आह्वान से हमारे अनुकूल हो. मैं जो कामना करता हूं, वह केवल मेरी हो, किसी अन्य को प्राप्त न हो. मैं अपनी कामना को सदा प्राप्त करूं. (२)
I serve the name of Saraswati, a voice that is manifested and blessed with good fortune. Just as the son is under the control of the mother, so keep my mind in control and be compatible with our call. What I wish for is mine only, no one else should get it. May I always receive my wish. (2)