2.1.5Atharvaved
मंत्र:२.१.५ (2.1.5)सूक्त (१)

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मंत्र:२.१.५ (2.1.5)सूक्त (१)

परि॒ विश्वा॒ भुव॑नान्यायमृ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं दृ॒शे कम् । यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॑मानशा॒नाः स॑मा॒ने योना॒वध्यैर॑यन्त ॥ (५)

ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व मैं ने पृथ्वी आदि लोकों को प्राप्त किया. इस का प्रयोजन ब्रह्म को देखना है जो इस विश्व का कारण है. उस ब्रह्म में इंद्र आदि देव अमृत का स्वाद लेते हुए अपनेआप को तन्मय कर देते हैं. (५)

Before the enlightenment, I attained the earth and the worlds. The purpose of this is to see Brahman, which is the cause of this world. In that Brahman, Indra adi dev tastes nectar and immerses himself. (5)