3.2.5Atharvaved
मंत्र:३.२.५ (3.2.5)सूक्त (२)

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मंत्र:३.२.५ (3.2.5)सूक्त (२)

अ॒मीषां॑ चि॒त्तानि॑ प्रतिमो॒हय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि । अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॒र्ग्राह्या॒मित्रां॒स्तम॑सा विध्य॒ शत्रू॑न् ॥ (५)

हे सुखों और प्राणों को नष्ट करने वाली अप्या नाम की पापदेवी! तुम हमारे शत्रुओं के हृदयों को भ्रमित करती हुई उन के शरीरों में व्याप्त हो जाओ. तुम हम से मुंह मोड़ कर हमारे शत्रुओं की ओर जाओ और रोग, भय आदि से उत्पन्न शोकों से उन के हुदयों को संतप्त करो. तुम अज्ञान रूप पिशाची के सहयोग से हमारा अहित चाहने वाले शत्रुओं को मार डालो. (५)

O sin goddess named Apya, who destroys pleasures and souls! You confuse the hearts of our enemies and pervade their bodies. Turn your back on us and go to our enemies and afflict their hearts with sorrows caused by disease, fear, etc. You kill the enemies who want to harm us with the help of the ignorant form Pishachi. (5)