3.7.2Atharvaved
मंत्र:३.७.२ (3.7.2)सूक्त (७)

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मंत्र:३.७.२ (3.7.2)सूक्त (७)

अनु॑ त्वा हरि॒णो वृषा॑ प॒द्भिश्च॒तुर्भि॑रक्रमीत् । विषा॑णे॒ वि ष्य॑ गुष्पि॒तं यद॑स्य क्षेत्रि॒यं हृ॒दि ॥ (२)

हे मृगशृंग! तुम्हें क्षेत्रीय रोगों का विनाश करने के लिए मैं ने मणि के रूप में धारण किया है. इस रोगी के हृदय में जो रोग बसे हुए हैं, तुम उन का विनाश करो. (२)

O deer! I have worn you as the gem for destroying regional diseases. Destroy the diseases that are settled in the heart of this patient. (2)