4.2.5Atharvaved
मंत्र:४.२.५ (4.2.5)सूक्त (२)

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मंत्र:४.२.५ (4.2.5)सूक्त (२)

यस्य॒ विश्वे॑ हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा स॑मु॒द्रे यस्य॑ र॒सामिदा॒हुः । इ॒माश्च॑ प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ (५)

जिस प्रजापति देव की महिमा से हिमालय आदि सभी पर्वत उत्पन्न हुए हैं, सागर में सभी सरिताएं जिस की महिमा से समा जाती हैं-पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण चार दिशाएं जिस प्रजापति की भुजाएं हैं, हम हवि के द्वारा उस की पूजा करते हैं. (५)

From the glory of Prajapati Dev, all the mountains like the Himalayas etc. have been born, all the streams in the ocean, whose glory is absorbed - east, west, north and south four directions, we worship him through Havi. (5)