4.4.3Atharvaved
मंत्र:४.४.३ (4.4.3)सूक्त (४)

Shlok 1 of 1

मंत्र:४.४.३ (4.4.3)सूक्त (४)

यथा॑ स्म ते वि॒रोह॑तो॒ऽभित॑प्तमि॒वान॑ति । तत॑स्ते॒ शुष्म॑वत्तरमि॒यं कृ॑णो॒त्वोष॑धिः ॥ (३)

हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! पुत्र, पौत्र आदि के रूप में विरोहण के कारण तेरी पुरुष इंद्रिय क्रोधित सांप के फन के समान चेष्टा कर सके, इसी कारण मैं तुझे यह ओषधि प्रदान करता हूं. (३)

O man wanting to! Due to defiance as son, grandson, etc., your male sense can try like an angry snake's hood, that is why I give you this medicine. (3)