5.1.2Atharvaved
मंत्र:५.१.२ (5.1.2)सूक्त (१)
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आ यो धर्मा॑णि प्रथ॒मः स॒साद॒ ततो॒ वपूं॑षि कृणुषे पु॒रूणि॑ । धा॒स्युर्योनिं॑ प्रथ॒म आ वि॑वे॒शा यो वाच॒मनु॑दितां चि॒केत॑ ॥ (२)
जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२)
The soul who follows dharma first of all and holds many bodies for this reason, who creates the speech attracted by nouns, enters the vagina first with the desire of food. (2)