5.1.3Atharvaved
मंत्र:५.१.३ (5.1.3)सूक्त (१)

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मंत्र:५.१.३ (5.1.3)सूक्त (१)

यस्ते॒ शोका॑य त॒न्वं॑ रि॒रेच॒ क्षर॒द्धिर॑ण्यं॒ शुच॒योऽनु॒ स्वाः । अत्रा॑ दधेते अ॒मृता॑नि॒ नामा॒स्मे वस्त्रा॑णि॒ विश॒ एर॑यन्ताम् ॥ (३)

हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३)

O Varuna! The soul who has come into the body to spread his fame like a golden, suffering for the practice of dharma for you, gives him immortality and the people give them clothes. (3)