5.2.8Atharvaved
मंत्र:५.२.८ (5.2.8)सूक्त (२)

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मंत्र:५.२.८ (5.2.8)सूक्त (२)

इ॒मा ब्रह्म॑ बृ॒हद्दि॑वः कृणव॒दिन्द्रा॑य शू॒षम॑ग्रि॒यः स्व॒र्षाः । म॒हो गो॒त्रस्य॑ क्षयति स्व॒राजा॒ तुर॑श्चि॒द्विश्व॑मर्णव॒त्तप॑स्वान् ॥ (८)

यह राजा स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महान स्तोत्रों द्वारा इंद्र को प्रसन्न कर रहा है. स्वर्ग के स्वामी इंद्र मेघों के द्वारा जल वर्षा कर के विश्व को जल से पूर्ण करते हैं. (८)

This king is pleasing Indra with great hymns with the desire to attain heaven. Indra, the swami of heaven, completes the world with water by showering water through clouds. (8)