5.2.9Atharvaved
मंत्र:५.२.९ (5.2.9)सूक्त (२)

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मंत्र:५.२.९ (5.2.9)सूक्त (२)

ए॒वा म॒हान्बृ॒हद्दि॑वो॒ अथ॒र्वावो॑च॒त्स्वां त॒न्वमिन्द्र॑मे॒व । स्वसा॑रौ मात॒रिभ्व॑री अरि॒प्रे हि॒न्वन्ति॑ चैने॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च ॥ (९)

अपने शरीर को इंद्र मान कर महर्षि अथर्वा ने कहा था कि पाप रहित भगिनियां इसे बल के द्वारा बढ़ाती हुई प्रसन्न करती हैं. (९)

Considering his body as Indra, Maharishi Atharva had said that sinless bhaginis please it by increasing it through force. (9)