5.3.2Atharvaved
मंत्र:५.३.२ (5.3.2)सूक्त (३)

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मंत्र:५.३.२ (5.3.2)सूक्त (३)

अग्ने॑ म॒न्युं प्र॑तिनु॒दन्परे॑षां॒ त्वं नो॑ गो॒पाः परि॑ पाहि वि॒श्वतः॑ । अपा॑ञ्चो यन्तु नि॒वता॑ दुर॒स्यवो॒ऽमैषां॑ चि॒त्तं प्र॒बुधां॒ वि ने॑शत् ॥ (२)

हे अग्नि देव! तुम हजारों शत्रुओं का क्रोध समाप्त करते हुए सभी ओर से हमारी रक्षा करो. हमें दुःख देने के इच्छुक लोग हमारे सामने नम्र बनें तथा हमारे सामने से चले जाएं. (२)

O God of Agni! You end the anger of thousands of enemies and protect us from all sides. Those willing to hurt us should be humble in front of us and leave in front of us. (2)