5.7.3Atharvaved
मंत्र:५.७.३ (5.7.3)सूक्त (७)
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प्र णो॑ व॒निर्दे॒वकृ॑ता॒ दिवा॒ नक्तं॑ च कल्पताम् । अरा॑तिमनु॒प्रेमो॑ व॒यं नमो॑ अ॒स्त्वरा॑तये ॥ (३)
हम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं. अराति को नमस्कार हो. (३)
The devotion of gods in us increased day by day. That is why we go to the shelter of Arati. Hello to Arati. (3)