7.3.1Atharvaved
मंत्र:७.३.१ (7.3.1)सूक्त (३)

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मंत्र:७.३.१ (7.3.1)सूक्त (३)

अ॒या वि॒ष्ठा ज॒नय॒न्कर्व॑राणि॒ स हि घृणि॑रु॒रुर्वरा॑य गा॒तुः । स प्र॒त्युदै॑द्ध॒रुणं॒ मध्वो॒ अग्रं॒ स्वया॑ त॒न्वा त॒न्वमैरयत ॥ (१)

इस माया के द्वारा विश्व आत्मा के रूप में स्थित यह प्रजापति यज्ञ आदि कर्मो को उत्पन्न करता है. वह दीप्तिशाली उत्तम कर्म फल के लिए महान मार्ग है. वह स्थायी एवं चिरकाल तक रहने वाले मधुर जल को उत्पन्न करता है. उस ने अपने विराट शरीर के द्वारा सभी प्राणियों के शरीरों को प्रेरित किया है. (१)

Through this Maya, this Prajapati, located in the form of the world soul, produces yagya etc. He is the great path to the glorious best karma fruit. It produces permanent and lasting sweet water. He has inspired the bodies of all beings through his vast body. (1)