7.5.4Atharvaved
मंत्र:७.५.४ (7.5.4)सूक्त (५)
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यत्पुरु॑षेण ह॒विषा॑ य॒ज्ञं दे॒वा अत॑न्वत । अ॑स्ति॒ नु तस्मा॒दोजी॑यो॒ यद्वि॒हव्ये॑नेजि॒रे ॥ (४)
यजमानों ने पुरुष रूप हवि से पुरुषमेध नामक यज्ञ का विस्तार किया. उस में जो ओजस्वी एवं सारवान है, उसे हवि के रूप में देखा. (४)
The hosts expanded the yajna called Purushamedh from the male form Havi. He saw the energetic and serene in him as Havi. (4)