8.2.4Atharvaved
मंत्र:८.२.४ (8.2.4)सूक्त (२)

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मंत्र:८.२.४ (8.2.4)सूक्त (२)

प्रा॒णेन॑ त्वा द्वि॒पदां॒ चतु॑ष्पदाम॒ग्निमि॑व जा॒तम॒भि सं ध॑मामि । नम॑स्ते मृत्यो॒ चक्षु॑षे॒ नमः॑ प्रा॒णाय॑ तेऽकरम् ॥ (४)

हे प्राणहीन पुरुष! मैं दो पैरों वाले अर्थात्‌ स्त्रीपुरुषों और चार पैरों वाले अर्थात्‌ गाय, घोड़े आदि पशुओं के प्राणों से तुझे इस प्रकार संयुक्त करता हूं, जिस प्रकार अरणि मंथन से अग्नि उत्पन्न होती है. हे मृत्यु! मैं ने तेरे क्रूर नेत्र के लिए नमस्कार किया है तथा तेरे अत्यधिक बल के लिए भी मैं नमस्कार करता हूं. (४)

O soulless man! I combine you with the lives of animals with two legs i.e. women and four feet i.e. cows, horses, etc., in such a way that agni is produced from the churning of the forest. O death! I have greeted you for your cruel eye and I also salute for your great strength. (4)