8.4.9Atharvaved
मंत्र:८.४.९ (8.4.9)सूक्त (४)

Shlok 1 of 1

मंत्र:८.४.९ (8.4.9)सूक्त (४)

ये पा॑कशं॒सं वि॒हर॑न्त॒ एवै॒र्ये वा॑ भ॒द्रं दू॒षय॑न्ति स्व॒धाभिः॑ । अह॑ये वा॒ तान्प्र॒ददा॑तु॒ सोम॒ आ वा॑ दधातु॒ निरृ॑तेरु॒पस्थे॑ ॥ (९)

जो राक्षस मुझ सत्यवादी की इच्छानुसार निंदा करते हैं और जो राक्षस मुझ कल्याणकारी के यज्ञ कर्म को अन्नों के द्वारा दूषित करते हैं-इन दोनों प्रकार के राक्षसों को सोमदेव सर्प के लिए दे दें अथवा पाप देवता निर्त्ति की गोद में बैठा दें. (९)

The demons who condemn me according to the will of the truthful and the demons who contaminate the sacrificial deeds of my welfare with food - give these two types of demons to Somdev snake or sit in the lap of sin god Nirti. (9)