9.3.8Atharvaved
मंत्र:९.३.८ (9.3.8)सूक्त (३)

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मंत्र:९.३.८ (9.3.8)सूक्त (३)

अक्षु॒मोप॒शं वित॑तं सहस्रा॒क्षं वि॑षू॒वति॑ । अव॑नद्धम॒भिहि॑तं॒ ब्रह्म॑णा॒ वि चृ॑तामसि ॥ (८)

हे दिव्यता संपन्न शाला! शयन कक्ष में विस्तृत झरोखा है. इस प्रकार के शयन कक्ष को मैं मंत्रों की शक्ति से खोलता हूं. (८)

O school of divinity! There is a wide window in the bedroom. I open this type of bedroom with the power of mantras. (8)