9.5.6Atharvaved
मंत्र:९.५.६ (9.5.6)सूक्त (५)
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उत्क्रा॒मातः॒ परि॑ चे॒दत॑प्तस्त॒प्ताच्च॒रोरधि॒ नाकं॑ तृ॒तीय॑म् । अ॒ग्नेर॒ग्निरधि॒ सं ब॑भूविथ॒ ज्योति॑ष्मन्तम॒भि लो॒कं ज॑यै॒तम् ॥ (६)
हे अज! तू इस तपे हुए अर्थात् परिपक्व चर के द्वारा स्वर्ग में जाने के लिए ऊपर चढ़. तू अन्ने के द्वारा अग्नि रूप हो गया है एवं प्रकाश वाले लोकों को प्राप्त कर. (६)
O Aj! You climb up to go to heaven by this hot i.e. mature variable. You have become a form of agni through the unknown and attain the worlds of light. (6)