9.7.10Atharvaved
मंत्र:९.७.१० (9.7.10)सूक्त (७)

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मंत्र:९.७.१० (9.7.10)सूक्त (७)

स॑र्व॒दा वा ए॒ष यु॒क्तग्रा॑वा॒र्द्रप॑वित्रो॒ वित॑ताध्वर॒ आहृ॑तयज्ञक्रतु॒र्य उ॑प॒हर॑ति ॥ (१०)

यजमान अतिथियों को अन्न देता रहता है, वह ग्रावाओं अर्थात्‌ सोमलता कूटने वाले पत्थरों से गीले यज्ञ का कर्ता और उस यज्ञ को पूर्ण करने वाला होता है. (१०)

The host keeps giving food to the guests, he is the doer of the wet yajna with the stones that crush the gravas i.e. somalata and the one who completes that yajna. (10)