Sanskrit

श॒तं मे॒षान्वृ॒क्ये॑ मामहा॒नं तमः॒ प्रणी॑त॒मशि॑वेन पि॒त्रा । आक्षी ऋ॒ज्राश्वे॑ अश्विनावधत्तं॒ ज्योति॑र॒न्धाय॑ चक्रथुर्वि॒चक्षे॑ ॥ (१७)

Hindi

हे अश्विनीकुमारो! वृकों के निमित्त सौ मेषों को समर्पित करने वाले एवं दुःखदायी पिता द्वारा अंधे बनाए गए ऋजाश्च को तुमने नेत्र दिए एवं उस अंधे को संसार देखने योग्य बनाया. (१७)

English

O Ashwinikumaro! You gave eyes to the sage, who had dedicated a hundred aries to the elders and was made blind by the grieving Father, and made the blind man worthy of seeing the world. (17)