1.121.5Rigved
श्लोक:१.१२१.५ (1.121.5)सूक्त (१२१)
Shlok 1 of 1
तुभ्यं॒ पयो॒ यत्पि॒तरा॒वनी॑तां॒ राधः॑ सु॒रेत॑स्तु॒रणे॑ भुर॒ण्यू । शुचि॒ यत्ते॒ रेक्ण॒ आय॑जन्त सब॒र्दुघा॑याः॒ पय॑ उ॒स्रिया॑याः ॥ (५)
हे क्षिप्रकारी इंद्र! तुम्हारे लिए जगत् के माता-पिता, धरती और आकाश ने बलवर्धक, वीर्यसंपन्न एवं धनयुक्त दुधारू गायों का दूध जिस समय अग्नि में अर्पित किया, तभी तुमने पणियों का द्वार खोल दिया था. (५)
O anointing Indra! For you, the parents of the world, the earth and the sky, opened the door of the pangs when they offered the milk of the strong, semen-rich and rich milch cows to the fire. (5)