1.151.7Rigved
श्लोक:१.१५१.७ (1.151.7)सूक्त (१५१)

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श्लोक:१.१५१.७ (1.151.7)सूक्त (१५१)

यो वां॑ य॒ज्ञैः श॑शमा॒नो ह॒ दाश॑ति क॒विर्होता॒ यज॑ति मन्म॒साध॑नः । उपाह॒ तं गच्छ॑थो वी॒थो अ॑ध्व॒रमच्छा॒ गिरः॑ सुम॒तिं ग॑न्तमस्म॒यू ॥ (७)

जो मेधावी एवं भली-भांति यज्ञ संपन्न करने वाला यजमान उत्तम यज्ञ साधनों द्वारा तुम्हारे निमित्त सोमयाग आदि के उद्देश्य से स्तुति करता हुआ हव्य देता है, उसी शोभनमति यजमान के समीप जाओ एवं उसी के यज्ञ की अभिलाषा करो. तुम हम पर कृपा की कामना करते हुए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो. (७)

The host who performs the meritorious and well-to-do yajna gives a greeting to you by means of the best sacrificial means praising you for the purpose of somayag, etc., go to the same Shobhanmati host and wish for his yajna. You wish us kindness while accepting our praises. (7)