Sanskrit
त्वम॑ग्ने॒ प्रय॑तदक्षिणं॒ नरं॒ वर्मे॑व स्यू॒तं परि॑ पासि वि॒श्वतः॑ । स्वा॒दु॒क्षद्मा॒ यो व॑स॒तौ स्यो॑न॒कृज्जी॑वया॒जं यज॑ते॒ सोप॒मा दि॒वः ॥ (१५)
Hindi
हे अग्नि! जिस यजमान ने ऋत्विजों को दक्षिणा दी है, उसकी तुम चारों ओर से उसी प्रकार रक्षा करो, जिस प्रकार सिला हुआ कवच शरीर की रक्षा करता है. जो यजमान अतिथियों को स्वादिष्ट अन्न खिलाकर सुखी करता है एवं अपने घर में प्राणियों से यज्ञ करवाता है, वह स्वर्ग के समान सुखकारी होता है. (१५)
English
O agni! Protect the host who has given dakshina to the ritwijas, in the same way as the sewn armor protects the body. The host who makes the guests happy by feeding them delicious food and makes the creatures in his home perform yajna, he is as pleasant as heaven. (15)
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