1.39.1Rigved
श्लोक:१.३९.१ (1.39.1)सूक्त (३९)
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प्र यदि॒त्था प॑रा॒वतः॑ शो॒चिर्न मान॒मस्य॑थ । कस्य॒ क्रत्वा॑ मरुतः॒ कस्य॒ वर्प॑सा॒ कं या॑थ॒ कं ह॑ धूतयः ॥ (१)
हे कंपनकारी मरुद्गणो! जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी तेज रोशनी धरती पर फेंकता है, उसी प्रकार जब तुम दूर आकाश से अपनी शक्ति धरती पर डालते हो तो तुम किस यज्ञ में किस यजमान द्वारा आकर्षित किए जाते हो तथा किस यजमान के समीप जाते हो? (१)
O vibrating deserts! Just as the sun throws its bright light from the sky to the earth, so when you pour your power from the distant sky onto the earth, in which yagna are you attracted by which host and near to which host do you go? (1)